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Essay On Artik Mandi In Hindi

इतिहास में महामंदी या भीषण मन्दी (द ग्रेट डिप्रेशन) (१९२९-१९३९) के नाम से जानी जाने वाली यह घटना एक विश्वव्यापी आर्थिक मंदी थी। यह सन १९२९ के लगभग शुरू हुई और १९३९-४० तक जारी रही। विश्व के आधुनिक इतिहास में यह सबसे बड़ी और सर्वाधिक महत्व की मंदी थी। इस घटना ने पूरी दुनिया में ऐसा कहर मचाया था कि उससे उबरने में कई साल लग गए। उसके बड़े व्यापक आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव हुए। इससे फासीवाद बढ़ा और अंतत: द्वितीय विश्वयुद्ध की नौबत आई। हालांकि यही युद्ध दुनिया को महामंदी से निकालने का माध्यम भी बना। इसी दौर ने साहित्यकारों और फिल्मकारों को भी आकर्षित किया और इस विषय पर कई किताबें लिखी गईं। अनेक फिल्में भी बनीं और खूब लोकप्रिय भी हुईं।

महामंदी की समयावली[संपादित करें]

आरम्भ[संपादित करें]

29 अक्टूबर 1929 को अमेरिका में शेयर बाजार में गिरावट से।

प्रस्थान[संपादित करें]

1930 से 1933 के बीच यह दुनिया के सभी प्रमुख देशों में फैल गई।

अंत[संपादित करें]

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के साथ ही यह काबू में आने लगी।

विकास पर प्रभाव[संपादित करें]

1930 के दशक की महामंदी को दुनिया की अब तक की सर्वाधिक विध्वंसक आर्थिक त्रासदी माना जाता है जिसने लाखों लोगों की जिंदगी नरक बना दी। इसकी शुरुआत 29 अक्टूबर 1929 को अमेरिका में शेयर मार्केट के गिरने से हुई थी। इस दिन मंगलवार था। इसलिए इसे काला मंगलवार (ब्लैक टच्यूसडे) भी कहा जाता है। इसके बाद अगले एक दशक तक दुनिया के अधिकांश देशों में आर्थिक गतिविधियां ठप्प रहीं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार खत्म हो गया।

मांग में भारी कमी हो गई और औद्योगिक विकास के पहिये जाम हो गए। लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। कृषि उत्पादन में भी 60 फीसदी तक की कमी हो गई। एक दशक तक हाहाकार मचाने के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के साथ ही इसका असर कम होने लगा।

कारण[संपादित करें]

अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट का इतना मनोवैज्ञानिक असर पड़ा कि वहां के लोगों ने अपने खर्चो में दस फीसदी तक की कमी कर दी जिससे मांग प्रभावित हुई।

लोगों ने बैंकों के कर्ज पटाने बंद कर दिए जिससे बैंकिंग ढांचा चरमरा गया। कर्ज मिलने बंद हो गए, लोगों ने बैंकों में जमा पैसा निकालना शुरू कर दिया। इससे कई बैंक दिवालिया होकर बंद हो गए।

1930 की शुरुआत मे अमेरिका में पड़े सूखे की वजह से कृषि बर्बाद हो गई जिससे कृषि अर्थव्यवस्था चरमरा गई। इसने ‘नीम पर करेले’ का काम किया।

अमेरिका की इस मंदी ने बाद में अन्य देशों को भी चपेट में ले लिया और देखते ही देखते यह महामंदी में तब्दील हो गई।

महामंदी का महाप्रभाव[संपादित करें]

  • 1 करोड़ 30 लाख लोग बेरोजगार हो गए।
  • 1929 से 1932 के दौरान औद्योगिक उत्पादन की दर में 45 फीसदी की गिरावट आई।
  • 1929 से 1932 के दौरान आवास निर्माण की दर में 80 फीसदी तक की कमी हो गई।
  • इस दौरान 5 हजार से भी अधिक बैंक बंद हो गए।

प्रमुख परिवर्तन[संपादित करें]

साम्यवाद के प्रति बढ़ा रुझान[संपादित करें]

साम्यवादी राष्ट्र होने के नाते सोवियत संघ ने खुद को पूंजीवादी व्यवस्था से काटकर रखा था। पूंजीवादी देश भी उसके साथ संबंध नहीं रखना चाहते थे। लेकिन इससे सोवियत संघ को फायदा ही हुआ और वह उस महामंदी से बच निकला जिसने पूंजीवादी देशों की कमर तोड़कर रख दी थी। इस दौरान सोवियत संघ में औद्योगिक विस्तार हुआ।

इससे मार्क्‍सवाद को प्रतिष्ठा मिली और उसे पूंजीवाद के विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा। यही कारण था कि कई प्रभावित देशों मंे इससे प्रेरित होकर सामाजिक व साम्यवादी प्रदर्शन व आंदोलन हुए।

फासीवाद को बढ़ावा[संपादित करें]

कई विशेषज्ञों का मानना है कि फासीवाद को बढ़ावा देने में इस महामंदी का भी हाथ रहा। फासीवादी नेताओं ने संबंधित देशों में इस बात का प्रचार शुरू कर दिया कि लोगों की खराब स्थिति के लिए उनके पूंजीवादी नेता ही जिम्मेदार है जिनसे फासीवाद ही बचा सकता है। जर्मनी में हिटलर ने इसी महामंदी के बहाने अपनी पकड़ मजबूत बनाई। जापान में हिदेकी तोजो ने चीन में घुसपैठ कर मंचुरिया में इस आधार पर खदानों का विकास किया कि इससे महामंदी से राहत मिलेगी। लेकिन इसका एक ही नतीजा निकला-द्वितीय विश्वयुद्ध।

शस्त्र अर्थव्यवस्था का उदय[संपादित करें]

इस महामंदी का सबसे बड़ा नतीजा यह हुआ कि अमेरिका जैसे देशों को अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए एक बड़ा फंडा हाथ लग गया। अमेरिका सहित विभिन्न देशों में सैन्य प्रसार-प्रचार से न केवल नौकरियों के द्वार खुले, बल्कि हथियारों के उत्पादन से अर्थव्यवस्थाओं में भी जान आ गई। इससे 1930 के दशक के उत्तरार्ध में महामंदी से निकलने में सहायता मिली। बाद में अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने इसे ही अपना खेवनहार बना लिया। आज हथियारों की बिक्री से इन देशों को भारी मुनाफा होता है।

पूंजीवाद मजबूत हुआ[संपादित करें]

महामंदी के दौर में पूंजीवाद से मोहभ्रम की स्थिति को समझते हुए अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी देशों को मजबूत बनाने की योजना क्रियान्वित की। ‘मार्शल प्लान’ नामक इस योजना का कागजों पर उद्देश्य तो विश्व युद्ध से पीड़ित देशों के पुनर्निर्माण में मदद करना था, लेकिन असली मकसद साम्यवाद के संभावित विस्तार को रोकना था। इसके तहत यूरोपीय देशों को 17 अरब डॉलर की वित्तीय व प्रौद्योगिकी सहायता दी गई। हालांकि इसके बावजूद सोवियत संघ की बढ़ती ताकत नहीं रोकी जा सकी।

आर्थिक संकट का विश्व पर प्रभाव[संपादित करें]

जर्मनी पर प्रभाव

आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप जर्मनी में बेरोजगारी अत्यधिक बढ़ी। 1932 ई. तक 60 लाख लोग बेरोजगार हो गये। इससे जर्मनी में बाह्य गणतंत्र की स्थिति दुर्बल हुईं हिटलर इसका फायदा उठाकर सत्ता में आ गया। इस प्रकार आर्थिक मंदी में जर्मनी ने नाजीवाद का शासन स्थापित किया।

ब्रिटेन पर प्रभाव

1931 ई. में आर्थिक मंदी के कारण ब्रिटेन को स्वर्णमान का परित्याग करना पड़ा। सरकार ने सोने का निर्यात बंद कर दिया। सरकार ने आर्थिक स्थिरीकरण की नीति अपनाई। इससे आर्थिक मंदी से उबरने में ब्रिटेन को मदद मिली। व्यापार में संरक्षण की नीति अपनाने से भी व्यापार संतुलन ब्रिटेन के पक्ष में हो गया। ब्रिटिश सरकार ने सस्ती मुद्रा दर को अपनाया जिससे बैंक दर में कमी आयी। इससे विभिन्न उद्योगों को बढ़ावा मिला।

फ्रांस पर प्रभाव

जर्मनी से अत्यधिक क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी, अतः आर्थिक मंदी का उस पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। फ्रांस की मुद्रा फ्रेंक अपनी साख बचाये रखने में सफल रही।

रूस पर प्रभाव

रूस में स्टालिन की आर्थिक नीतियों एवं पंचवर्षीय योजनाओं से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी। अतः वह भी आर्थिक मंदी से प्रभावित नहीं हुआ। इससे विश्व के समक्ष साम्यवादी व्यवस्था की मजबूती एवं पूँजीवादी व्यवस्था का खोखलापन उजागर हुआ।

अमेरिका पर प्रभाव

अमेरिका में बेरोजगारी 15 लाख से बढ़कर 1 करोड़ 30 लाख हो गई। यूरोप में आर्थिक मंदी के कारण अमेरिका का यूरोपीय ऋण डूबने की स्थिति में आ गया। 1932 ई. के चुनाव में आर्थिक संकट के कारण रिपब्लिक पार्टी का हूवर पराजित हुआ। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार रूसवेल्ट ने आर्थिक सुधार कार्यक्रम की घोषणा के बल पर ही चुनाव जीता।

अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट की न्यू डील[संपादित करें]

मुख्य लेख : न्यू डील

आर्थिक मंदी से उबरने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने न्यू डील की घोषणा की। न्यू डील के उद्देश्यों का सार उन्होंने इन शब्दों में बताया,

हम अपनी अर्थव्यवस्था द्वारा कृषि और उद्योगों में संतुलन लाना चाहते हैं। हम मजदूरी करने वालों, रोजगार देने वालों और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन कायम करना चाहते हैं। हमारा यह भी उद्देश्य है कि हमारे आंतरिक बाजार समृद्ध और विशाल बने रहे और अन्य देशों के साथ हमारा व्यापार बढ़े।

रूजवेल्ट की न्यू डील से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगे। औद्योगिक एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई निम्नतम मजदूरी दर और अधिकतम काम के घंटे नियत किये गये। इस प्रकार धीरे-धीरे आर्थिक मंदी से उबरने की ओर अमेरिका अग्रसर हुआ। अतः फ्रेंकलिन रूजवेल्ट की न्यू डील सफल साबित हुई।

महामंदी पर पुस्तकें[संपादित करें]

महामंदी पर कई किताबें लिखी गईं। इनमें सबसे प्रसिद्ध हुई जॉन स्टीनबेक लिखित ‘द ग्रेप्स ऑफ राथ’ जो 1939 में प्रकाशित हुई थी। इसे साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला। उसी दौर में आईं पुस्तकें द ग्रेट डिप्रेशन (एलॉन बर्शेडर), ऑफ माइस एंड मैन (जॉन स्टीनबेक), टु किल ए मॉकिंगबर्ड (हार्पर ली) भी महामंदी की तस्वीर को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करती हैं। इसी विषय पर मार्ग्रेट एटवुड के उपन्यास ‘द ब्लाइंड असेसिन’ को 2000 में बुकर पुरस्कार मिला। दो साल पहले डेविड पॉट्स ने ‘द मिथ ऑफ द ग्रेट डिप्रेशन’ किताब लिखी।

फिल्में[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

हम अपने आर्थिक इतिहास के सबसे विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं. वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि इस साल भारतीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 9 फ़ीसदी के आसपास रहेगी.

एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा केंद्र सरकार अब तक की अपनी इकलौती उपलब्धि का हवाला देते हुए यही कहती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है.

अगर हम सरकारी बयानों पर भरोसा करें तो दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसमें किसी शांत द्वीप समूह की भांति स्थिर है.

इसके मुताबिक़ मनमोहन सिंह की ख़राब अर्थव्यवस्था वाला दौर अब बीत चुका है.

हालांकि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, रुपये का अवमूल्यन हुआ है. यही वजह है कि सरकार के आशावादी रुझान और बाज़ार के रुझान में तालमेल नहीं दिख रहा है.

एनडीटीवी के प्रणय रॉय के साथ एक बेहतरीन साक्षात्कार में मोर्गन स्टेनले के रुचिर शर्मा ने भारतीय आर्थिक परिदृश्य के बारे में कुछ अहम बातें कही हैं. उन्होंने वैश्विक बाज़ार के रुझानों का अध्ययन किया है.

उसके आधार पर एकत्रित आंकड़ों और संकेतों के आधार पर रुचिर ने जो बातें कहीं है, उनमें पहली बात तो यही है कि 2015 के दौरान वैश्विक कारोबार में शून्य प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

दूसरी बात ये है कि शून्य प्रतिशत बढ़ोत्तरी अमूमन मंदी के समय होती है, इसका मतलब ये हुआ कि हम लोग मंदी में प्रवेश कर रहे हैं. इसके अलावा एक संकेत ये भी है कि मंदी अमूमन हर आठवें साल आती है और इस तर्क के आधार पर मंदी का आना ही है.

तीसरी बात, भारतीय निर्यात काफ़ी गिरा है और इसमें शून्य से पांच फ़ीसदी कम की वृद्धि दर्ज की गई है. जब निर्यात की दर शून्य से पांच फ़ीसदी कम हो तो भारत की आर्थिक विकास दर कभी आठ फ़ीसदी नहीं हो सकती. (जब भारत की आर्थिक विकास दर 8 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ रही थी, तब निर्यात भी सालाना 20 फ़ीसदी से ज़्यादा की दर से बढ़ रहा था.)

चौथी बात ये है कि भारत दुनिया का सबसे व्यापार संरक्षणवादी देश बना हुआ है. मोदी के कार्यकाल में शायद ही कोई आर्थिक सुधार हुआ है.

दुनिया भर के देशों में, 2015 में व्यापार के नज़रिए से सबसे सुरक्षात्मक क़दम उठाने वाले देशों में भारत दूसरे नंबर पर रहा है. मैं व्यक्तिगत तौर पर इससे अचरज में हूं क्योंकि हम लगातार कई सुधार के बारे में सुन रहे हैं, जिसमें विपक्ष रोड़े अटका रहा है, लेकिन सरकार सुधार के लिए सक्रिय क़दम उठा रही है, इसके बारे में कुछ नहीं सुना है.

पांचवीं बात, भारत की 500 शीर्ष कंपनियों की बिक्री में 2015 में शून्य फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. मार्च, 2016 में ख़त्म हो रहे वित्तीय साल के दौरान उन्हें हानि उठानी पड़ सकती है. यह निर्यात में नकारात्मक वृद्धि दर के बाद दूसरा संकेत है जो बताता है कि भारत की विकास दर भी संकट में है.

छठी बात ये है कि सरकार के जीडीपी आंकड़े और कॉरपोरेट के प्रदर्शन में विरोधाभास है. इसके चलते ही भारत सरकार के आंकड़ों की विश्वसनीयता संदेह में है. इसके अलावा मुश्किलों को बढ़ाने वाले दूसरे संकेत भी मिल रहे हैं.

साख में वृद्धि (नई आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए क़र्ज़ लेने की स्थिति) में भी गिरावट है. भारतीय कॉरपोरेट घरानों पर भारी भरकम क़र्ज़ है और भारत के सार्वजनिक बैंकों के क़र्ज़ में बहुत बड़ी मात्रा गैर निष्पादित क़र्ज़ (नॉन पॉरफॉर्मिंग लोन्स) की है.

हालांकि सरकार अपने आंकड़ों पर यक़ीन कर रही है और कहा है कि वह कुछ चीज़ों पर काम कर रही है, जिसमें टैक्स संग्रह को बढ़ाने की बात शामिल है, यह अनुमान आधारित क़यासों से विश्वसनीय नज़र आता है.

इसके अलावा 2016 में भारत में मौजूद विदेशी संस्थाओं की वृद्धि दर कहीं ज़्यादा क़रीब सात फ़ीसदी रहने की संभावना है. इससे वह तस्वीर उभरती है, जिसे आप विचित्र कह सकते है, जिसका ज़िक्र मैंने शुरुआत में ही किया है.

क्या हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर दौर में और इसकी विकास दर नौ फ़ीसदी के क़रीब होगी? या फिर हमारी आर्थिक व्यवस्था ख़राब दौर में है और हम मंदी की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

क्या सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है या फिर 2015 की तरह इस साल भी कोई सुधार नहीं होगा?

इन परस्थितियों में एक बात तो तय है कि दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं. या तो पहली तस्वीर सही होगी या फिर दूसरी.

ऐसे में एक सवाल तो ये भी है कि सरकार के आंकड़ों और रुचिर शर्मा की बातों में इतना अंतर क्यों है? वित्त मंत्री का भरोसा बाज़ार में भी नज़र क्यों नहीं आ रहा है? क्या यह इसलिए है कि इसमें केवल अंतरराष्ट्रीय पहलुओं का ध्यान रखा गया है, भारत की घरेलू परिस्थितियों का नहीं.

वैसे मुझे सरकार के आंकड़ों को स्वीकार करने में कोई मुश्किल नहीं है. मेरे ख़्याल से यह ऐसा मसला है जिसे प्रधानमंत्री को कहीं सीधे तौर पर संबोधित करने की ज़रूरत है. हर महीने या तो ऐसे आंकड़े आ रहे हैं जो सरकार के आशावादी नज़रिए से मेल नहीं खा रहे हैं या फिर उलझन बढ़ा रहे हैं.

उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल की बिक्री लगातार बढ़ती रही है लेकिन उसका निर्यात कम होता गया. इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि को लेकर भी कोई आकलन मौजूद नहीं है.

यहां तक कि तेल की क़ीमतें भी, हमारी सोच के मुताबिक़ कोई अच्छा समाचार नहीं दे रही है. रुचिर शर्मा के मुताबिक़ तेल की क़ीमतों में कोई गिरावट होती है या 30 डॉलर प्रति बैरल की मौजूदा दर भी क़ायम रही तो भी यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब ख़बर है और यह बताता है कि आर्थिक मंदी दूर नहीं है.

मुझे ये स्वीकार करने में ख़ुशी है कि मौजूदा सरकार में उच्च स्तरों पर मनमोहन सिंह के कार्यकाल की तुलना में कम भ्रष्टाचार है. लेकिन मेरे लिए ये मामूली बात है. भारतीयों के लिए सबसे अहम मुद्दा ये सतत विकास दर ही है, जो उन्हें ग़रीबी से निकालने का इकलौता रास्ता है.

अगर एक मज़बूत सरकार और अपने विज़न और उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट नेता के होने के बावजूद हम ऐसा नहीं कर पाए, तो हमें बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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